9 मिनट में संपूर्ण महाभारत और गीता का सार: एब्बी वायरल (Abby Viral) का महाकाव्य रैप
क्या आपने कभी सोचा है कि महाभारत के उस विशाल युद्ध और श्रीमद्भगवद्गीता के अगाध ज्ञान को सिर्फ 9 मिनट में समेटा जा सकता है? सुनने में यह नामुमकिन लगता है, लेकिन एब्बी वायरल (Abby Viral) और प्रखर लेखक कवि अमित शर्मा की जोड़ी ने इसे एक मास्टरपीस के रूप में पेश किया है।
यह सिर्फ एक ‘रैप’ नहीं है, बल्कि कुरुक्षेत्र के उस रणघोष की आधुनिक गूंज है जिसने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है। जब अर्जुन मोहवश अपना ‘गांडीव’ छोड़ देते हैं और भगवान श्री कृष्ण उन्हें धर्म और कर्म का पाठ पढ़ाते हैं, तो वह संवाद आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक लगता है।
इस पोस्ट में हम आपके लिए लेकर आए हैं “संपूर्ण महाभारत रैप” के शब्द-दर-शब्द (Lyrics), ताकि आप संगीत के साथ-साथ इस महान गाथा के हर एक शब्द की गहराई को महसूस कर सकें। चाहे आप इतिहास प्रेमी हों या अध्यात्म की तलाश में, कवि अमित शर्मा की लेखनी और Abby Viral का अंदाज़ आपको सीधे युद्धभूमि के बीचों-बीच ले जाएगा।

कुरुक्षेत्र और 9 Minutes Viral गीता सार (देवनागरी Full AbbyViral Rap Lyrics) Written by Kavi Amit Sharma and Music by Inkarnate
तलवार धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए
रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सामने आड़े हुए
कई लाख सेना के सामने पांडव पांच बिचारे थे
एक तरफ थे योद्धा सब एक तरफ समय के मारे थे
महासमर की प्रतीक्षा में सारे ताक रहे थे जी
लेकिन पार्थ के रथ को तो खुद केशव हाक रहे थे जी
रणभूमि के सभी नजारे देखने में कुछ खास लगे
माधव ने अर्जुन को देखा अर्जुन उन्हें उदास लगे
कुरुक्षेत्र का महासमर एक पल में तभी सजा डाला
शंख उठा श्री कृष्ण ने मुख से फूँका और बजा डाला
हुआ शंखनाद जैसे ही वैसे सबका गर्जन शुरू हुआ
रक्त बिखरेना हुआ शुरू और सबका मर्दन शुरू हुआ
कृष्ण ने उठो पार्थ और एक आँख को मीच ज़रा
गांडीव पर रख बाणों को प्रत्यंचा को खींच ज़रा
आज दिखा दे रणभूमि में योद्धा की तासीर यहाँ
इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ
इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ
इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ
इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ
इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ
सुनी बात माधव की तो अर्जुन का चेहरा उतर गया
एक धनुर्धारी की विद्या मानो चूहा कुतर गया
बोले पार्थ सुनो कान्हा जितने सामने है ये खड़े हुए
इन्हीं सब से सीख सीख कर सारे भाई है बड़े हुए
उधर खड़े है भीष्म पितामह मुझको गोद खिलाते थे
गुरु द्रोण ने धनुष-बाण का सारा ज्ञान सिखाते थे
सभी भाई पर प्यार लुटाया कुंती माता हमारी ने
कोई कमी ना छोड़ी कभी थी उस माता गांधारी ने
ये जितने गुरुजन खड़े हुए है सब पूजने लायक है
माना लिया दुर्योधन दुशासन थोड़े से नालायक है
मैं अपराध क्षमा करता हूँ बेशक हम ही छोटे है
ये जैसे भी है आखिर माधव सब ताऊ के बेटे है
इतने से भूख भाग की खातिर हिंसक नहीं बनूँगा मैं
स्वर्ण ताक्कर अपने कुल का विध्वंसक नहीं बनूँगा मैं
खून सने हाथों को होता राज-भोग अधिकार नहीं
सबको मार के गद्दी मिले तो सिंहासन स्वीकार नहीं
रथ पर बैठ गया अर्जुन मुँह माधव से था मोड़ दिया
आँखों में आंसू भरकर गांडीव जो हाथ से छोड़ दिया
गांडीव जब छूटा तब माधव भी कुछ अकुचाये थे
शिष्य पार्थ पर गर्व हुआ और मन ही मन हर्षाये थे
मन में सोच लिया अर्जुन की बुद्धि ना सटने दूँगा
समर भूमि में पार्थ को कमज़ोर नहीं पड़ने दूँगा
धर्म बचाने की खातिर फिर नव अभियान शुरू हुआ
उसके बाद जगत गुरु का गीता ज्ञान शुरू हुआ
एक नज़र में रणभूमि के कण-कण डोल गए माधव
टक-टकी बाँध के देखा अर्जुन एकदम बोल गए माधव –
हे! पार्थ मुझे पहले बतलाते मैं संवाद नहीं करता
तुम सारे भाईयों की खातिर कोई विवाद नहीं करता
पांचाली के तन पर लिपटे साड़ी खींच रहे थे वो
दोषी वो भी उतने ही है जबड़ा भिंच रहे थे जो
घर की इज़्ज़त तड़प रही कोई दो टूक नहीं बोले
पौत्र बहु को नग्न देखकर गंगा पुत्र नहीं खाले
तुम कायर बन कर बैठे हो ये पार्थ बड़ी बेशर्मी है
सम्बन्ध उन्हीं से निभा रहे जो लोग यहाँ अधर्मी है
धर्म के ऊपर यहाँ आज भारी संकट है खड़ा हुआ
और तेरा गांडीव पार्थ क्यों रथ के कोने में पड़ा हुआ
धर्म पे संकट के बादल तुम छाने कैसे देते हो
कायरता के भाव को मन में आने कैसे देते हो
हे पांडु के पुत्र! धर्म का कैसा क़र्ज़ उतारा है
शोले होने थे! आँखों में पर बहते जल धारा है
धर्म-अधर्म की गहराई में खुद को नाप रहा अर्जुन
अश्रुधार फिर तेज़ हुई और थर-थर काँप रहा अर्जुन
हे केशव! ये रक्त स्वयं का पीना नहीं सरल होगा
यदि विजय हुए तो भी यहाँ जीना नहीं सरल होगा
हे माधव! मुझे बतलाओ कुल नाशक कैसे बन जाऊं
रख सिंहासन लाशों पर मैं शासक कैसे बन जाऊं
कैसे उठेंगे कर उन पर जो कर पर अधर लगाते है?
करने को जिनका स्वागत ये कर भी खुद जुड़ जाते है
इन्हीं करों ने बाल्य काल में सबके पैर दबाए है
इन्हीं करों को पकड़ करों में पितामह मुस्काये है
नोक जो अपने बाणों की फिर इनकी ओर करूँगा मैं
केशव मुझको मृत्यु दे दो उससे पूर्व मरूँगा मैं
बाद युद्ध के मुझे ना कुछ भी पास दिखाई देता है
माधव! इस रणभूमि में बस नाश दिखाई देता है
बात बहुत भावुक थी पर जगत गुरु मुस्काते थे
ज्ञान की गंगा गीता द्वारा चक्रधारी बरसाते थे
जन्म-मरण की योद्धा यहाँ पे बिल्कुल चाह नहीं करते
क्या होगा अंजाम युद्ध का ये परवाह नहीं करते
हे पार्थ! यहाँ कुछ मत सोचो बस कर्म में ध्यान लगाओ तुम!
बाद युद्ध के क्या होगा ये मत अनुमान लगाओ तुम
इस दुनिया के रक्तपात में कोई तो अहसास नहीं
निज जीवन का करे फैसला नर के बस की ये बात नहीं
तुम ना जीवन देने वाले नहीं मारने वाले हो
ना जीत तुम्हारे हाथों में तुम नहीं हारने वाले हो
ये जीवन दीपक की भांति यूँ ही जलता रहता है
पवन वेग से बुझ जाता है वरना जलता रहता है
मानव वश में शेष नहीं कुछ फिर भी मानव डरता है
वह मर कर भी अमर हुआ जो धर्म की खातिर मरता है
ना सत्ता सुख से होता है ना सम्मानों से होता है
जीवन का सार सफल बस बलिदानों से होता है
देहदान योद्धा ही करते है ना कोई दूजा जाता है
रणभूमि में वीर मरे तो शव भी पूजा जाता है
सेना युद्ध में जैसे अपने खोते शस्त्र बदलती है
दिव्य आत्मा मानव देह में वैसे वस्त्र बदलती है
हे केशव! कुछ समझ गया पर कुछ-कुछ असमंजस में हूँ
इतना समझ गया कि मैं ना स्वयं ही खुद के वश में हूँ
ये मान और सम्मान बताओ जीवन के अपमान बताओ
जीवन मृत्यु क्या है माधव? रण में जीवन दान बताओ
काम क्रोध की बात कही मुझको उत्तम काम बताओ
अरे! खुद को ईश्वर कहते हो तो जल्दी अपना नाम बताओ
इतना सुनते ही माधव का धीरज पूरा डोल गया
तीनों लोकों का स्वामी फिर बेहद गुस्से में बोल गया
सारे सृष्टि को भगवान बेहद गुस्से में लाल दिखे
देवलोक के देव डरे सबको माधव में काल दिखे
अरे! कान खोल कर सुनो पार्थ मैं ही त्रेता का राम हूँ
कृष्ण मुझे सब कहते है मैं द्वापर का घनश्याम हूँ
“रूप कभी नर नारी का धर के मैं ही केश बदलता हूँ
धर्म बचाने की खातिर में भेष बदलता हूँ!”
“विष्णु जी का दशम रूप मैं परशुराम मतवाला हूँ
ना कालिया के फण पे मैं मर्दन करने वाला हूँ!”
“बकासुर और महिषासुर को मैंने ज़िंदा कर दिया
नरसिंह बन के धर्म की खातिर हिरण्यकश्यप फाड़ दिया!”
“रक्त निक नहीं भी चलता है मैं ही आगे बढ़ता हूँ
धनुष हाथ में तेरे पर रणभूमि में लड़ता हूँ!”
इतना कहकर मौन हुए फिर खुद ही सकुचाये केशव
पलक झपकते ही अपने दिव्य रूप में आये केशव
दिव्य रूप का तेज़ अनोखा सबसे अलग दमकता था
कई लाख सूरज जितना चेहरे पर तेज़ चमकता था
इतने ऊँचे थे भगवान सिर लगता था
और हज़ारों बुझाने कर अर्जुन को डर लगता था
पवनजल उनके कदमों को चूम रहा था और
तर्जनी उंगली में चक्र सुदर्शन घूम रहा था
नदियों की कल कल सागर का शोर सुनाई देता था
श्री कृष्ण के अंदर पूरा ब्रह्मांड दिखाई देता था
जैसे ही मेरे माधव का थोड़ा सा बड़ा हुआ
सहमा सहमा था अर्जुन एकदम रथ पर फिर खड़ा हुआ
गीता के से सीधे हृदय में ऐसे प्रहार हुआ
मृत्यु के आलिंगन के लिए फिर अर्जुन तैयार हुआ
मैं धर्म भुजा का वाहक हूँ मुझको कोई मार नहीं सकता
जिसकी रथ पर भगवान हो वो युद्ध में हार नहीं सकता
जितने यहाँ अधर्मी हैं चुन चुन कर उन्हें सज़ा दूँगा
इतना रक्त बहाऊंगा धरती की प्यास बुझा दूँगा
अर्जुन की आँखों में धर्म का राज दिखाई देता था
पार्थ में अब के केशव को बस यमराज दिखाई देता था
जिधर चले फिर बाण पार्थ के सब पीछे हट जाते थे
रणभूमि के कोने कोने लाशों से पट जाते हैं
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
कुरु-क्षेत्र की भूमि पे तब नाच नचाया अर्जुन ने
सारी धरती लाल मचाया अर्जुन ने
बड़े-बड़े योद्धाओं को भी नानी याद दिलायी थी
मृत्यु का वह ताण्डव था जो मृत्यु भी घबराई थी
ऐसा लगता था सबको मृत्यु से प्यार हुआ है जी
धर्म का ऐसा युद्ध जगत में पहली बार हुआ है जी
धर्मराज के शिष्य के ऊपर राजमुकुट की छाया थी
पर ये दुनिया जानती थी ये बस शक की माया थी
धर्म की रक्षा करने वाले दाता दया निधान की जिए
हाथ उठाकर सारे बोलो चक्रधारी भगवान की जय!
धर्म की रक्षा करने वाले दाता दया निधान कीजिये
कमेंट के सेक्शन में सारे बोलो भगवान की जय!
चक्रधारी भगवान की जय!


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