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  • राम की शक्ति पूजा: जब श्रीराम भी हुए व्याकुल! सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कालजयी रचना (Full Lyrics)

    राम की शक्ति पूजा: जब श्रीराम भी हुए व्याकुल! सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कालजयी रचना (Full Lyrics)

    जब रावण जैसे अहंकार के सामने धर्म की शक्ति डगमगाने लगे, जब न्याय की आँखों में भी आँसू हों और जब स्वयं ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ हताश होकर कह उठें—अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति! तब जन्म होता है उस संकल्प का जिसे हम ‘राम की शक्ति पूजा’ के नाम से जानते हैं।

    महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की यह कविता सिर्फ लंका के मैदान की कहानी नहीं है, बल्कि हर उस इंसान की दास्तान है जो अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। यह कविता हमें सिखाती है कि जब बाहरी साधन कम पड़ने लगें, तो अपनी आंतरिक ‘शक्ति’ को जगाना ही एकमात्र विकल्प है।

    AbbyViral.com पर आज हम इस महान काव्य को साझा कर रहे हैं ताकि हम अपनी जड़ों से जुड़ सकें और समझ सकें कि ‘शक्ति’ की मौलिक कल्पना ही हर अंधेरे का अंत करती है। नीचे इस महाकाव्य का पूर्ण पाठ (Lyrics) दिया गया है।

    Lyrics:

    रवि हुआ अस्त : ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
    रह गया राम-रावण का अपराजेय समर

    आज का, तीक्ष्ण-शर-विधृत-क्षिप्र-कर वेग-प्रखर,
    शतशेलसंवरणशील, नीलनभ-गर्ज्जित-स्वर,

    प्रतिपल-परिवर्तित-व्यूह-भेद-कौशल-समूह,—
    राक्षस-विरुद्ध प्रत्यूह,—क्रुद्ध-कपि-विषम—हूह,

    विच्छुरितवह्नि—राजीवनयन-हत-लक्ष्य-बाण,
    लोहितलोचन-रावण-मदमोचन-महीयान,

    राघव-लाघव-रावण-वारण—गत-युग्म-प्रहर,
    उद्धत-लंकापति-मर्दित-कपि-दल-बल-विस्तर,

    Ram ki shakti pooja Breakdown

    अनिमेष-राम-विश्वजिद्दिव्य-शर-भंग-भाव,—
    विद्धांग-बद्ध-कोदंड-मुष्टि—खर-रुधिर-स्राव,

    रावण-प्रहार-दुर्वार-विकल-वानर दल-बल,—
    मूर्च्छित-सुग्रीवांगद-भीषण-गवाक्ष-गय-नल,

    वारित-सौमित्र-भल्लपति—अगणित-मल्ल-रोध,
    गर्ज्जित-प्रलयाब्धि—क्षुब्ध—हनुमत्-केवल-प्रबोध,

    उद्गीरित-वह्नि-भीम-पर्वत-कपि-चतुः प्रहर,
    जानकी-भीरु-उर—आशाभर—रावण-सम्वर।

    लौटे युग-दल। राक्षस-पदतल पृथ्वी टलमल,
    बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल।

    वानर-वाहिनी खिन्न, लख निज-पति-चरण-चिह्न
    चल रही शिविर की ओर स्थविर-दल ज्यों विभिन्न;

    प्रशमित है वातावरण; नमित-मुख सांध्य कमल
    लक्ष्मण चिंता-पल, पीछे वानर-वीर सकल;

    रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण,
    श्लथ धनु-गुण है कटिबंध स्रस्त—तूणीर-धरण,

    दृढ़ जटा-मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
    फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल

    उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशांधकार,
    चमकती दूर ताराएँ ज्यों हों कहीं पार।

    आए सब शिविर, सानु पर पर्वत के, मंथर,
    सुग्रीव, विभीषण, जांबवान आदिक वानर,

    सेनापति दल-विशेष के, अंगद, हनुमान
    नल, नील, गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान

    करने के लिए, फेर वानर-दल आश्रय-स्थल।
    बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर; निर्मल जल

    ले आए कर-पद-क्षालनार्थ पटु हनुमान;
    अन्य वीर सर के गए तीर संध्या-विधान—

    वंदना ईश की करने को, लौटे सत्वर,
    सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर।

    पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर,
    सुग्रीव, प्रांत पर पाद-पद्म के महावीर;

    यूथपति अन्य जो, यथास्थान, हो निर्निमेष
    देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश।

    है अमानिशा; उगलता गगन घन अंधकार;
    खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार;

    अप्रतिहत गरज रहा पीछे अंबुधि विशाल;
    भूधर ज्यों ध्यान-मग्न; केवल जलती मशाल।

    स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय,
    रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय;

    जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रांत,—
    एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रांत,

    कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार,
    असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।

    ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत
    जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि, अच्युत

    देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन
    विदेह का,—प्रथम स्नेह का लतांतराल मिलन

    नयनों का—नयनों से गोपन—प्रिय संभाषण,
    पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन,

    काँपते हुए किसलय,—झरते पराग-समुदय,
    गाते खग-नव-जीवन-परिचय,—तरु मलय—वलय,

    ज्योति प्रपात स्वर्गीय,—ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,
    जानकी—नयन—कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

    सिहरा तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त,
    हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,

    फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर,
    फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आई भर,

    वे आए याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत,—
    फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,

    देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,
    ताड़का, सुबाहु, विराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर;

    फिर देखी भीमा मूर्ति आज रण देखी जो
    आच्छादित किए हुए सम्मुख समग्र नभ को,

    ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ-बुझकर हुए क्षीण,
    पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन,

    लख शंकाकुल हो गए अतुल-बल शेष-शयन,—
    खिंच गए दृगों में सीता के राममय नयन;

    फिर सुना—हँस रहा अट्टहास रावण खलखल,
    भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ता-दल।

    बैठे मारुति देखते राम—चरणारविंद
    युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक-रूप, गुण-गण—अनिंद्य;

    साधना-मध्य भी साम्य—वाम-कर दक्षिण-पद,
    दक्षिण-कर-तल पर वाम चरण, कपिवर गद्-गद्

    पा सत्य, सच्चिदानंदरूप, विश्राम-धाम,
    जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम-नाम।

    युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल,
    देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल;

    ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,—
    सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ;

    टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल,
    संदिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल

    बैठे वे वही कमल-लोचन, पर सजल नयन,
    व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर-प्रफुल्ल मुख, निश्चेतन।

    ‘ये अश्रु राम के’ आते ही मन में विचार,
    उद्वेल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार,

    हो श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल,
    एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल,

    शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़,
    जल राशि-राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़

    तोड़ता बंध—प्रतिसंध धरा, हो स्फीत-वक्ष
    दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।

    शत-वायु-वेग-बल, डुबा अतल में देश-भाव,
    जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव

    वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश
    पहुँचा, एकादशरुद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।

    रावण-महिमा श्मामा विभावरी-अंधकार,
    यह रुद्र राम-पूजन-प्रताप तेजःप्रसार;

    उस ओर शक्ति शिव की जो दशस्कंध-पूजित,
    इस ओर रुद्र-वंदन जो रघुनंदन-कूजित;

    करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल,
    लख महानाश शिव अचल हुए क्षण-भर चंचल,

    श्यामा के पदतल भारधरण हर मंद्रस्वर
    बोले—“संबरो देवि, निज तेज, नहीं वानर

    यह,—नहीं हुआ शृंगार-युग्म-गत, महावीर,
    अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय-शरीर,

    चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य,
    मर्यादा-पुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य

    लीलासहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार
    करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार;

    विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध,
    झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।

    कह हुए मौन शिव; पवन-तनय में भर विस्मय
    सहसा नभ में अंजना-रूप का हुआ उदय;

    बोली माता—“तुमने रवि को जब लिया निगल
    तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल;

    यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह-रह,
    यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह-सह;

    यह महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल—
    पूजते जिन्हें श्रीराम, उसे ग्रसने को चल

    क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ?—सोचो मन में;
    क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्रीरघुनंदन ने?

    तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य—
    क्या असंभाव्य हो यह राघव के लिए धार्य?

    कपि हुए नम्र, क्षण में माताछवि हुई लीन,
    उतरे धीरे-धीरे, गह प्रभु-पद हुए दीन।

    राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण,
    ”हे सखा”, विभीषण बोले, “आज प्रसन्न वदन

    वह नहीं, देखकर जिसे समग्र वीर वानर—
    भल्लूक विगत-श्रम हो पाते जीवन—निर्जर;

    रघुवीर, तीर सब वही तूण में हैं रक्षित,
    है वही वक्ष, रण-कुशल हस्त, बल वही अमित,

    हैं वही सुमित्रानंदन मेघनाद-जित-रण,
    हैं वही भल्लपति, वानरेंद्र सुग्रीव प्रमन,

    तारा-कुमार भी वही महाबल श्वेत धीर,
    अप्रतिभट वही एक—अर्बुद-सम, महावीर,

    है वही दक्ष सेना-नायक, है वही समर,
    फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव-प्रहर?

    रघुकुल गौरव, लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
    तुम फेर रहे हो पीठ हो रहा जब जय रण!

    कितना श्रम हुआ व्यर्थ! आया जब मिलन-समय,
    तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय!

    रावण, रावण, लंपट, खल, कल्मष-गताचार,
    जिसने हित कहते किया मुझे पाद-प्रहार,

    बैठा उपवन में देगा दु:ख सीता को फिर,—
    कहता रण की जय-कथा पारिषद-दल से घिर;—

    सुनता वसंत में उपवन में कल-कूजित पिक
    मैं बना किंतु लंकापति, धिक्, राघव, धिक् धिक्!

    सब सभा रही निस्तब्ध : राम के स्तिमित नयन
    छोड़ते हुए, शीतल प्रकाश देखते विमन,

    जैसे ओजस्वी शब्दों का जो था प्रभाव
    उससे न इन्हें कुछ चाव, न हो कोई दुराव;

    ज्यों हों वे शब्द मात्र,—मैत्री की समनुरक्ति,
    पर जहाँ गहन भाव के ग्रहण की नहीं शक्ति।

    कुछ क्षण तक रहकर मौन सहज निज कोमल स्वर
    बोले रघुमणि—मित्रवर, विजय होगी न समर;

    यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण,
    उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमंत्रण;

    अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति! कहते छल-छल
    हो गए नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल,

    रुक गया कंठ, चमका लक्ष्मण-तेजः प्रचंड,
    धँस गया धरा में कपि गह युग पद मसक दंड,

    स्थिर जांबवान,—समझते हुए ज्यों सकल भाव,
    व्याकुल सुग्रीव,—हुआ उर में ज्यों विषम घाव,

    निश्चित-सा करते हुए विभीषण कार्य-क्रम,
    मौन में रहा यों स्पंदित वातावरण विषम।

    निज सहज रूप में संयत हो जानकी-प्राण
    बोले—“आया न समझ में यह दैवी विधान;

    रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर—
    यह रहा शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर!

    करता मैं योजित बार-बार शर-निकर निशित
    हो सकती जिनसे यह संसृति संपूर्ण विजित,

    जो तेजःपुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार
    है जिनमें निहित पतनघातक संस्कृति अपार—

    शत-शुद्धि-बोध—सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक,
    जिनमें है क्षात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक,

    जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
    वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खंडित!

    देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक,
    लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक;

    हत मंत्रपूत शर संवृत करतीं बार-बार,
    निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार!

    विचलित लख कपिदल, क्रुद्ध युद्ध को मैं ज्यों-ज्यों,
    झक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यों-त्यों,

    पश्चात्, देखने लगीं मुझे, बँध गए हस्त,
    फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बँधा मैं हुआ त्रस्त!

    कह हुए भानुकुलभूषण वहाँ मौन क्षण-भर,
    बोले विश्वस्त कंठ से जांबवान—रघुवर,

    विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
    हे पुरुष-सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,

    आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
    तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर;

    रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त
    तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,

    शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन,
    छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनंदन!

    तब तक लक्ष्मण हैं महावाहिनी के नायक
    मध्य भाग में, अंगद दक्षिण-श्वेत सहायक,

    मैं भल्ल-सैन्य; हैं वाम पार्श्व में हनूमान,
    नल, नील और छोटे कपिगण—उनके प्रधान;

    सुग्रीव, विभीषण, अन्य यूथपति यथासमय
    आएँगे रक्षाहेतु जहाँ भी होगा भय।”

    खिल गई सभा। ‘‘उत्तम निश्चय यह, भल्लनाथ!”
    कह दिया वृद्ध को मान राम ने झुका माथ।

    हो गए ध्यान में लीन पुनः करते विचार,
    देखते सकल-तन पुलकित होता बार-बार।

    कुछ समय अनंतर इंदीवर निंदित लोचन
    खुल गए, रहा निष्पलक भाव में मज्जित मन।

    बोले आवेग-रहित स्वर से विश्वास-स्थित—
    मातः, दशभुजा, विश्व-ज्योतिः, मैं हूँ आश्रित;

    हो विद्ध शक्ति से है खल महिषासुर मर्दित,
    जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्ज्जित!

    यह, यह मेरा प्रतीक, मातः, समझा इंगित;
    मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनंदित।”

    कुछ समय स्तब्ध हो रहे राम छवि में निमग्न,
    फिर खोले पलक कमल-ज्योतिर्दल ध्यान-लग्न;

    हैं देख रहे मंत्री, सेनापति, वीरासन
    बैठे उमड़ते हुए, राघव का स्मित आनन।

    बोले भावस्थ चंद्र-मुख-निंदित रामचंद्र,
    प्राणों में पावन कंपन भर, स्वर मेघमंद्र—

    “देखो, बंधुवर सामने स्थित जो यह भूधर
    शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुंदर,

    पार्वती कल्पना हैं। इसकी, मकरंद-बिंदु;
    गरजता चरण-प्रांत पर सिंह वह, नहीं सिंधु;

    दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,
    अंबर में हुए दिगंबर अर्चित शशि-शेखर;

    लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व—
    मानव के मन का असुर मंद, हो रहा खर्व’’

    फिर मधुर दृष्टि से प्रिय कपि को खींचते हुए—
    बोले प्रियतर स्वर से अंतर सींचते हुए

    “चाहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इंदीवर,
    कम-से-कम अधिक और हों, अधिक और सुंदर,

    जाओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर,
    तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।”

    अवगत हो जांबवान से पथ, दूरत्व, स्थान,
    प्रभु-पद-रज सिर धर चले हर्ष भर हनूमान।

    राघव ने विदा किया सबको जानकर समय,
    सब चले सदय राम की सोचते हुए विजय।

    निशि हुई विगतः नभ के ललाट पर प्रथम किरण
    फूटी, रघुनंदन के दृग महिमा-ज्योति-हिरण;

    है नहीं शरासन आज हस्त-तूणीर स्कंध,
    वह नहीं सोहता निविड़-जटा दृढ़ मुकुट-बंध;

    सुन पड़ता सिंहनाद,—रण-कोलाहल अपार,
    उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार;

    पूजोपरांत जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,
    मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम;

    बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण,
    गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन।

    क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस,
    चक्र से चक्र मन चढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस;

    कर-जप पूरा कर एक चढ़ाते इंदीवर,
    निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर।

    चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित मन,
    प्रति जप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण;

    संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर,
    जप के स्वर लगा काँपने थर-थर-थर अंबर;

    दो दिन-निष्पंद एक आसन पर रहे राम,
    अर्पित करते इंदीवर, जपते हुए नाम;

    आठवाँ दिवस, मन ध्यान-युक्त चढ़ता ऊपर
    कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर,

    हो गया विजित ब्रह्मांड पूर्ण, देवता स्तब्ध,
    हो गए दग्ध जीवन के तप के समारब्ध,

    रह गया एक इंदीवर, मन देखता-पार
    प्रायः करने को हुआ दुर्ग जो सहस्रार,

    द्विप्रहर रात्रि, साकार हुईं दुर्गा छिपकर,
    हँस उठा ले गई पूजा का प्रिय इंदीवर।

    यह अंतिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
    राम ने बढ़ाया कर लेने को नील कमल;

    कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल
    ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल,

    देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय
    आसन छोड़ना असिद्धि, भर गए नयनद्वयः—

    “धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
    धिक् साधन, जिसके लिए सदा ही किया शोध!

    जानकी! हाय, उद्धार प्रिया का न हो सका।”
    वह एक और मन रहा राम का जो न थका;

    जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय
    कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,

    बुद्धि के दुर्ग पहुँचा, विद्युत्-गति हतचेतन
    राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।

    “यह है उपाय” कह उठे राम ज्यों मंद्रित घन—
    “कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन!

    दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
    पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”

    कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
    ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक;

    ले अस्त्र वाम कर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
    ले अर्पित करने को उद्यत हो गए सुमन।

    जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
    काँपा ब्रह्मांड, हुआ देवी का त्वरित उदय :—

    ‘‘साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
    कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।

    देखा राम ने—सामने श्री दुर्गा, भास्वर
    वाम पद असुर-स्कंध पर, रहा दक्षिण हरि पर:

    ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र-सज्जित,
    मंद स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित,

    हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
    दक्षिण गणेश, कार्तिक बाएँ रण-रंग राग,

    मस्तक पर शंकर। पदपद्मों पर श्रद्धाभर
    श्री राघव हुए प्रणत मंदस्वर वंदन कर।

    ”होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन!”
    कह महाशक्ति राम के वदन में हुईं लीन।

  • दानवीर कर्ण: महाभारत का श्रापित योद्धा | Abby Viral x Abhay Nirbheek (Official Lyrics)

    दानवीर कर्ण: महाभारत का श्रापित योद्धा | Abby Viral x Abhay Nirbheek (Official Lyrics)

    महाभारत का वो योद्धा, जिसे दुनिया ने हमेशा ‘सूत-पुत्र’ कहकर ठुकराया, लेकिन जिसकी दानवीरता के सामने स्वयं इंद्र भी नतमस्तक हो गए।

    महाभारत के इतिहास में कर्ण एक ऐसा चरित्र है, जिसकी वीरता और नियति (Fate) के बीच हमेशा संघर्ष रहा। वह कुंती का ज्येष्ठ पुत्र था, पर पांडवों का शत्रु कहलाया। वह दुनिया का सबसे महान धनुर्धर बन सकता था, पर उसे पग-पग पर श्राप मिले।

    एब्बी वायरल (Abby Viral) और अभय निर्भीक (Abhay Nirbheek) की जोड़ी ने इस महागाथा को एक नए कलेवर में पेश किया है। यह रैप सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि कर्ण के उस स्वाभिमान और बलिदान की कहानी है, जो आज भी ‘रश्मिरथी’ के पन्नों में अमर है।

    चाहे दुर्योधन की दोस्ती हो या कवच-कुंडल का दान, इस रैप का एक-एक शब्द कर्ण के उस संघर्ष को बयां करता है जिसे सदियों तक न्याय नहीं मिला।

    नीचे पढ़िए ‘दानवीर कर्ण – महाभारत का श्रापित योद्धा’ रैप के पूरे बोल (Lyrics):

    धीर-वीर गंभीर करना था युद्ध नीति का ज्ञानी
    वीर ना उसके जैसा, कोई ना उसके जैसा था दानी
    तीर चलाता बिजली सा, वो शस्त्रों का अभ्यासी
    वाणी से शस्त्रार्थ करे तो लगता था संयासी
    आसमान तक शोर मचाए विजय धनुष तांकार
    सारे तीर करण के सीधे गिरते जाकर सागर पार
    ज्ञान का ना ही बल का करता था वो तानिक घमंड
    शान भर में ही कर देता दुश्मन के अंगीन खंड
    रण-कौशल में उसके जैसा, जग में कोई नहीं था
    दुनिया के लाखों प्रश्नों का उत्तर सिर्फ वही था
    रण थल का आभूषण था वो, धरती का सम्मान
    पन्नों में अपने इतिहास के, वो है वीरों की पहचान
    जब कर्ण चला समरंगण में, अर्जुन का तेज परखने
    तीरों पे जब तीर चले, फिर पांडव लगे तड़पने
    कुरुक्षेत्र में स्वाद युद्ध का, चखने और चखाने
    अंग राज रधेया चला, अब रण कौशल दिखलाने
    महावीर जब रथ पर चढ़कर, समर भूमि में आया
    पांडव सेना पर घिर आई, भय की काली छाया
    भागो-भागो प्राण बचाओ, हर कोई चिल्लाया
    माधव के अतिरिक्त ना समझा कोई कर्ण की माया
    केशव बोले सुनो पार्थ, तुम समय ना व्यर्थ गवाओ
    विजय चाहते हो तो पहले अपना बाण चलाओ
    दुर्योधन आया है करने, मानवता का मर्दन
    किंतु कर्ण की मुठी में है, मृत्यु की भी गर्दन
    कर्ण खड़ा है दुर्योधन के, प्रति कर्तव्य निभाने
    युद्ध भूमि में दानवीर, आया है कर्जचुकाने
    सूत पुत्र यह सूर्य वीर, अब किंचित नहीं झुकेगा
    इसके विजय धनुष से, बाणों का अब हमला नहीं रुकेगा
    अग्निकुंड में गई सामन, वो युद्ध भसम कर देगा
    जीत ताज का दुर्योधन के, मस्तक पर धार देगा
    कौन्तेय ने प्रत्यंचा पर, ज्यों ही बाण चढ़ाया
    शेर से क्रोधित सूर्य पुत्र, को अपने सम्मुख पाया
    अर्जुन बोला सूत पुत्र, मैं तेरे प्राण हरूंगा
    धर्म राज के चरणों में, गौरव का ताज धरूंगा
    पांचाली की आंखों में, अब आंसू नहीं रहेंगे
    अभिमन्यु के आज हत्यारे, जीवित नहीं बचेंगे
    शांत हुई वह अग्नि लगी थी, लक्षाग्रह आंगन में
    सिर्फ रक्त से आग बुझेगी, धड़क रही जो आंखों में
    अर्जुन की बातों को सुनकर, फिर अंग राज ये बोला
    मैंने जिसको योधा समझा, निकला बालक भोला
    वीर पुरुष यूँ शब्दों से लोगों को नहीं डराते
    योधा अपने पौरुष का गौरव नहीं गिराते
    सच्चे योधा शब्द त्याग कर शास्त्र से बातें करते
    भुजदंडों के दम पर ही वो दुनिया का ताम हरते
    युद्ध भूमि में परखा जाता, रण का कौशल सारा
    समरंगण ही तय करता है, कौन काल से हारा
    लगे बाण पर बाण बरसाने, युद्ध हुआ तब भीषण
    राह पतन की लेकर आया, मृत्यु वाला सीज़न
    आसमान में विद्युत जैसे बादल लगे कड़कने
    दोनो वीरों के भीतर की ज्वाला ऐसे लगी भड़कने
    रण भूमि से दूर नगर के नर नारी चिल्लाए
    कुरुक्षेत्र के महाप्रलय से, ईश्वर आज बचाए
    तभी कर्ण के रथ का पहिया दल-दल में था आया
    बलशाली अश्वों ने अपना पूरा ज़ोर लगाया
    लेकिन कर्ण की किस्मत को कुछ भी स्वीकार नहीं था
    पहिया बाहर आ ना सका था, अब तक धंसा वहीं था
    धनुष रखा तब कर्ण निहत्था, रथ से नीचे आया
    अर्जुन ने भी बाण रोक कर, क्षत्रिय धर्म निभाया
    लेकिन कृष्ण वही खड़े थे उसी वक़्त वो बोले
    अर्जुन के मन में फिर कैसे रोप रहे थे शोले
    परशुराम का दिया हुआ अभिशाप व्यर्थ न जाए
    कर्ण की वो ब्रह्मास्त्र की विद्या कैसे दिए भुलाए
    युद्ध भूमि में उंच-नीच तुम अर्जुन नहीं बिछारो
    सूर्य पुत्र की छाती पर अब अंतिम बाण उतारो
    सूर्य पुत्र की छाती पर अब अंतिम बाण उतारो
    माधव के वचनों को सुनकर अर्जुन कुछ सकुचाया
    दिव्य शक्तियों को आमंत्रित कर गांडीव उठाया
    शास्त्र हीन पर लक्ष्य साध कर अर्जुन ने शर छोड़ा
    तीर कर्ण को मार विजय रथ को फिर ऐसे मोड़ा
    मिली पराजय, किंतु कर्ण ने जय को गले लगाया
    रवि का बेटा देह त्याग कर, रवि में पुनः समाया
    दांशीलता का दानी से हुआ आज अतिरेक
    देह दान कर किया कर्ण ने मृत्यु का अभिषेक
    ज्ञानी दानी वीर धनुर्धार, विदा हुआ था आज
    धर्म राज के सिर पर आया कुल का रक्तिम ताज
    धर्म राज के सिर पर आया कुल का रक्तिम ताज
    हाहाहा कुल का रक्तिम ताज

  • Full Lyrics – Kalyug VS Krishna Lyrics Hindi Rap by AbbyViral | Kavita Performed by Ashutosh Rana

    Full Lyrics – Kalyug VS Krishna Lyrics Hindi Rap by AbbyViral | Kavita Performed by Ashutosh Rana

    कलयुग का अंधेरा और कान्हा की चेतावनी: ‘Kalyug VS Krishna’ रैप का पूरा सच!

    आज के दौर में जहाँ हर तरफ आपाधापी, स्वार्थ और अधर्म का बोलबाला है, वहाँ एब्बी वायरल (Abby Viral) एक ऐसा आईना लेकर आए हैं जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनका नया रैप “Kalyug VS Krishna” केवल एक गाना नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक लड़ाई है।

    इस रैप में एक तरफ ‘कलयुग’ अपने अहंकार और आधुनिक बुराइयों का बखान करता है, तो दूसरी तरफ भगवान श्री कृष्ण अपनी शांत मगर वज्र जैसी वाणी से उसे उसकी औकात याद दिलाते हैं। यह संवाद आज के समाज की कड़वी सच्चाई को बड़ी बेबाकी से पेश करता है।

    अगर आप भी इस पावरफुल रैप के हर एक शब्द को गहराई से समझना चाहते हैं, तो आप सही जगह आए हैं। नीचे हमने आपके लिए Kalyug VS Krishna Lyrics को पूरा और शुद्ध हिंदी में दिया है।

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    har अशुद्धि के लिए मैं शुद्ध होना चाहता हूँ,

    aur kaali buddhi ka मैं बुद्ध होना चाहता हूँ.

    चाहता हूँ shristi में yuddh चारों ओर हो,

    इस dharti के प्रेम se मैं क्रुद्ध होना चाहता हूँ.

    चाहता हूँ तोड़ देना सत्य की deenar ko

    चाहता हूँ मोड़ देना prem ki guhar ko

    चाहता हूँ इस धरा पर paap फूले और फले,

    चाहता हूँ इस जगत के हर हृदय में छल पले.

    मैं नहीं vo रावण jo aake मुझको मार doge

    मैं नहीं वह कंस जिसकी बाँह तुम उखाड़ doge

    paap ka mai devta hu mujhko पहचान लो,

    khelta hu mind se ye raaz तुम bhi जान लो.

    तुम्हारे भक्त भी मेरी पकड़ में आ गए हैं,

    मारना है मुझको तो, पहले इन्हें मार दो,

    युद्ध करना चाहो तो insaniyat ki haar ho

    dharm ki ho haani, ab adharm ki pukaar ho

    sab तुम्हारे भक्त jan bhi ab विरोधी हो गए हैं,

    rab तुम्हारे संतजन bhi kab se क्रोधी हो गए है.

    मैं नहीं hun बस me kisi राम,कृष्ण और बुद्ध ke

    ab karunga नाश h manushya ke vajood ke

    अब नहीं मैं ग़लतियाँ वैसी करूँ जो कर चुका,

    aur रावण bhi वीर था jo कब का छल से मर चुका.

    मार diya कंस को bhi कुश्ती ke khel me

    ye kalyug hai suno na hone vala fail mai

    कंस- रावण- दुर्योधन तुमको नहीं पहचानते थे,

    kaisa ladna ज़िद पकड़ना yuddh me vo jaan dete 

    fact ko ni jaante the

    मैं ni abse छोटी बात पर अड़ जाऊँ jo

    dimaag se chalaak ख़ोटी बात se बढ़ जाऊँ to

    naa hi जीतता दुनिया me अब किसी भी देश को,

    ghaseet ta mai neechta manushyata ke bhesh ko

    मैंने सुना था tumhara इन्हीं की देह में tha वास

    धर्म, कर्म, पाठ-पूजा poore desh ka vinash

    इन्हीं की aastha bani thi raasta

    aur aaj na daraar lu ye banenge mera naasta

    aaj insaniyat pe paap ka jo vaas hai

    samaaj ka har ek electron mera das hai

    काटना चाहो mujhko पहले इनको काट दो,

    aaj bhrast kar chuka vikas ke vigyaan ko

    बचो अपने ही भक्तों से, ab सम्हालो जान को,

    ho सके तो तुम बचा लो aaj अपने  मान को.

    अब नहीं मैं- रूप धरके, सज-सँवर के घूमता हूँ,

    अब नहीं मैं छल कपट को सर पे रख के घूमता हूँ.

    अब नहीं हैं निंदनीय चोरी aur hatya

    हुए अभिनंदनीय झूठ vale tathya

    mai hi hu kalyug…kaal ka mai baap hu

    ubar na paaye koi bhi vinash ka mai shraap mu

    Han maana tu hai chal-kapat

    Is jaha me har-wakhat

    Kar raha Tu nash sabka

    Ro raha mai sir pakad

    क्यूँ है क्रोध मन में तेरे इतना सच के वास्ते

    चाहता क्यों बंद करना धर्म वाले रास्ते

    मुझ को चुनौती देके तू जो भगवान होना चाहता है।

    पुतला अज्ञान का है तू पर ज्ञान होना चाहता है।

    तू समय का मात्र प्रतिवाद और विवाद है

    तो खामखा क्यों ब्रह्म वाला नाद होना चाहता है।

    तू ही तो हलाहल है इस समय की चाल का।

    तू स्वयं ही विश्व का गोपाल होना चाहता है।

    तू स्वयं को कंश और रावण से better मानता है।

    तू स्वयं को विकट शक्ति शाली योद्धा जानता है।

    तू नहीं है कुछ भी कलि सत्य को तू जान ले।

    कुछ भी तेरे वश में नहीं, बात मेरी मान ले।

    जो बीत गया तू ऐसा कल या आने वाले कल छल।

    मै वर्तमान का महाराग, मै सदा उपस्थित पुलकित पल।

    तू बीते कल की ग्लानि है या आने वाली चिंता है।

    मै वर्तमान आनंदित छन , ये विश्व मुझी में खिलता है।

    तू कल की बाते करता है, मैं कल्कि बन के आता हूँ।

    और तेरे कल की बातो को ,मैं कल्कि आज मिटाता हूँ।

    तू कलि कपट का ताला है, मैं कल्कि उस की चाभी हूँ।

    तू शंका की है महाधुंध, मैं समाधान की लाली हूँ

    कल का मतलब जो बीत गया, कल का मतलब जो आएगा

    कल का मतलब है जो मशीन, कल जो वो दुख पहुचायेगा।

    कल का मतलब जो ग्लानि है ,कल का मतलब जो चिंता है।

    कल का मतलब जो पास नहीं , कल कभी किसी को मिलता है।

    कल तो बस एक खुमारी है, कल बीत रही बीमारी है।

    कल मानवता की आशा भी, कल तो उसकी बेकारी है।

    कल वो जिस का अस्तित्व नहीं, कल वो जिस का व्यक्तित्व नहीं।

    तु बस है कलयुग एक कल्पना, जीवन तू का सत्य नहीं।

    सुन कलि अभी तू कच्चा है, तू वीर नहीं बस बच्चा है।

    चल तुझ को आज बताता हूँ मैं विश्व रूप दिखलाता हूँ

    मैं सत्य नारायण आदी पुरुष, सच से तुझको मिलवाता हूँ

    मै अखिल विश्व की श्रद्धा हूँ , मै सबके दिल की की भक्ति हूँ

    भटके अर्जुन की कुरुक्षेत्र में, जीतने वाली शक्ति हूँ

    जब सत्य जागता है मुझ मै, मै सतयुग नाम धराता हूँ।

    जब राम प्रकट हो जाते है ,  मै त्रेता युग कहलाता हूँ

    जब न्याय – धर्म की इच्छा हो, द्वापर युग हो जाता हूँ।

    जब काम, क्रोध, मद , लोभ उठे , तब कलि काल कहलाता हूँ

    और मस्त मगन जब होता हूँ, तब शिव शंभु कहलाता हूँ

    फिर नृत्य करूँ मै तांडव सा तब मै महाकाल हो जाता हूँ

    मै महादेव का डमरू,  हैं जिनके सर पर चाँद

    मै  परशुराम का फरसा मैं ही श्री राम का बाण

    तू रावण का कोलाहल है, और कंश का हाहाकार

    में सृष्टि का हूँ विजय नाद, और धर्म की जय जयकार।

    में भी अनंग, तू भी अनंग

    तू संग संग , में अंग अंग

    तू है अरूप, में दिव्य रूप

    तु कल है, कपट का है कुरूप

    तु खण्ड-खण्ड, मैं हूँ अखण्ड,

    मैं शान्तिरूप हूँ मैं प्रचण्ड

    मैं ही सकार, मैं ही नकार,

    मैं धुआंधार, मैं ही मकार

    मैं ही पुकार, चीत्कार,

    मैं नमस्कार, मैं चमत्कार

    और मैं ही हूँ तूफान, मैं ध्यान

    मैं ज्ञान, मैं सर्व शक्तिमान, 

    बैरियों का बैर, प्रेमियों की प्रीत,

    निर्बलों का मान, पुण्य की मैं जीत

    मैं ही खटपट, मैं ही झटपट, मैं ही मंदिर मस्जिद का पट

    मैं ही इस घट, मैं ही उस घट, मैं ही पनिहारिन और पनघट

    मैं ही अटकन, मैं ही भटकन, मैं ही इस जीवन की चटकन

    मैं अर्थवान, मैं धर्मवान, मैं मोक्षवान, मैं कर्मवान

    मैं ज्ञानवान, विज्ञानवान, मैं दयावान, मैं समाधान

    कर्म भी मै हूँ, मर्म भी मै हूँ, जीवन का सब धर्म भी मैं हूँ

    जीवन के इस पार भी मैं हूँ, जीवन के उस पार भी मैं हूँ

    जीवन का उद्देश्य भी मैं हूँ, जीवन का उपकार भी मैं हूँ

    आह भी मैं हूँ, वाह भी मैं हूँ, इस जीवन की चाह भी मैं हूँ

    तन भी मैं हूँ, मन भी मैं हूँ, इस जीवन का धन भी मैं हूँ

    आन भी मैं हूँ, मान भी मैं हूँ, इस जीवन की शान भी मैं हूँ

    ज्ञान भी मैं हूँ, दान भी मैं हूँ, जीवन का अभिमान भी मैं हूँ

    जीत भी मैं हूँ, हार भी मैं हूँ, इस जीवन का सार भी मैं हूँ

    सन्त भी मैं हूँ, अंत भी मैं हूँ, आदि और अनंत भी मैं हूँ

    भूख प्यास और आस भी मैं हूँ, जीवन का विश्वास भी मैं हूँ

    kaise पार beta मुझसे पायेगा, Kaise mere saamne टिक पायेगा

    सत्य aur धर्म vale पैरों tale, भूमि पर hi buri tarah कुचला जायेगा

  • Abby Viral & Kavi Amit Sharma – Mahabharat Rap Full Lyrics: The Complete Geeta Saar in 9 Minutes

    Abby Viral & Kavi Amit Sharma – Mahabharat Rap Full Lyrics: The Complete Geeta Saar in 9 Minutes

    9 मिनट में संपूर्ण महाभारत और गीता का सार: एब्बी वायरल (Abby Viral) का महाकाव्य रैप

    क्या आपने कभी सोचा है कि महाभारत के उस विशाल युद्ध और श्रीमद्भगवद्गीता के अगाध ज्ञान को सिर्फ 9 मिनट में समेटा जा सकता है? सुनने में यह नामुमकिन लगता है, लेकिन एब्बी वायरल (Abby Viral) और प्रखर लेखक कवि अमित शर्मा की जोड़ी ने इसे एक मास्टरपीस के रूप में पेश किया है।

    यह सिर्फ एक ‘रैप’ नहीं है, बल्कि कुरुक्षेत्र के उस रणघोष की आधुनिक गूंज है जिसने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है। जब अर्जुन मोहवश अपना ‘गांडीव’ छोड़ देते हैं और भगवान श्री कृष्ण उन्हें धर्म और कर्म का पाठ पढ़ाते हैं, तो वह संवाद आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक लगता है।

    इस पोस्ट में हम आपके लिए लेकर आए हैं “संपूर्ण महाभारत रैप” के शब्द-दर-शब्द (Lyrics), ताकि आप संगीत के साथ-साथ इस महान गाथा के हर एक शब्द की गहराई को महसूस कर सकें। चाहे आप इतिहास प्रेमी हों या अध्यात्म की तलाश में, कवि अमित शर्मा की लेखनी और Abby Viral का अंदाज़ आपको सीधे युद्धभूमि के बीचों-बीच ले जाएगा।

    कुरुक्षेत्र और 9 Minutes Viral गीता सार (देवनागरी Full AbbyViral Rap Lyrics) Written by Kavi Amit Sharma and Music by Inkarnate

    तलवार धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए

    रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सामने आड़े हुए

    कई लाख सेना के सामने पांडव पांच बिचारे थे

    एक तरफ थे योद्धा सब एक तरफ समय के मारे थे

    महासमर की प्रतीक्षा में सारे ताक रहे थे जी

    लेकिन पार्थ के रथ को तो खुद केशव हाक रहे थे जी

    रणभूमि के सभी नजारे देखने में कुछ खास लगे

    माधव ने अर्जुन को देखा अर्जुन उन्हें उदास लगे

    कुरुक्षेत्र का महासमर एक पल में तभी सजा डाला

    शंख उठा श्री कृष्ण ने मुख से फूँका और बजा डाला

    हुआ शंखनाद जैसे ही वैसे सबका गर्जन शुरू हुआ

    रक्त बिखरेना हुआ शुरू और सबका मर्दन शुरू हुआ

    कृष्ण ने उठो पार्थ और एक आँख को मीच ज़रा

    गांडीव पर रख बाणों को प्रत्यंचा को खींच ज़रा

    आज दिखा दे रणभूमि में योद्धा की तासीर यहाँ

    इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ

    इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ

    इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ

    इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ

    इस धरती पर कोई नहीं है अर्जुन के जैसा वीर यहाँ

    सुनी बात माधव की तो अर्जुन का चेहरा उतर गया

    एक धनुर्धारी की विद्या मानो चूहा कुतर गया

    बोले पार्थ सुनो कान्हा जितने सामने है ये खड़े हुए

    इन्हीं सब से सीख सीख कर सारे भाई है बड़े हुए

    उधर खड़े है भीष्म पितामह मुझको गोद खिलाते थे

    गुरु द्रोण ने धनुष-बाण का सारा ज्ञान सिखाते थे

    सभी भाई पर प्यार लुटाया कुंती माता हमारी ने

    कोई कमी ना छोड़ी कभी थी उस माता गांधारी ने

    ये जितने गुरुजन खड़े हुए है सब पूजने लायक है

    माना लिया दुर्योधन दुशासन थोड़े से नालायक है

    मैं अपराध क्षमा करता हूँ बेशक हम ही छोटे है

    ये जैसे भी है आखिर माधव सब ताऊ के बेटे है

    इतने से भूख भाग की खातिर हिंसक नहीं बनूँगा मैं

    स्वर्ण ताक्कर अपने कुल का विध्वंसक नहीं बनूँगा मैं

    खून सने हाथों को होता राज-भोग अधिकार नहीं

    सबको मार के गद्दी मिले तो सिंहासन स्वीकार नहीं

    रथ पर बैठ गया अर्जुन मुँह माधव से था मोड़ दिया

    आँखों में आंसू भरकर गांडीव जो हाथ से छोड़ दिया

    गांडीव जब छूटा तब माधव भी कुछ अकुचाये थे

    शिष्य पार्थ पर गर्व हुआ और मन ही मन हर्षाये थे

    मन में सोच लिया अर्जुन की बुद्धि ना सटने दूँगा

    समर भूमि में पार्थ को कमज़ोर नहीं पड़ने दूँगा

    धर्म बचाने की खातिर फिर नव अभियान शुरू हुआ

    उसके बाद जगत गुरु का गीता ज्ञान शुरू हुआ

    एक नज़र में रणभूमि के कण-कण डोल गए माधव

    टक-टकी बाँध के देखा अर्जुन एकदम बोल गए माधव –

    हे! पार्थ मुझे पहले बतलाते मैं संवाद नहीं करता

    तुम सारे भाईयों की खातिर कोई विवाद नहीं करता

    पांचाली के तन पर लिपटे साड़ी खींच रहे थे वो

    दोषी वो भी उतने ही है जबड़ा भिंच रहे थे जो

    घर की इज़्ज़त तड़प रही कोई दो टूक नहीं बोले

    पौत्र बहु को नग्न देखकर गंगा पुत्र नहीं खाले

    तुम कायर बन कर बैठे हो ये पार्थ बड़ी बेशर्मी है

    सम्बन्ध उन्हीं से निभा रहे जो लोग यहाँ अधर्मी है

    धर्म के ऊपर यहाँ आज भारी संकट है खड़ा हुआ

    और तेरा गांडीव पार्थ क्यों रथ के कोने में पड़ा हुआ

    धर्म पे संकट के बादल तुम छाने कैसे देते हो

    कायरता के भाव को मन में आने कैसे देते हो

    हे पांडु के पुत्र! धर्म का कैसा क़र्ज़ उतारा है

    शोले होने थे! आँखों में पर बहते जल धारा है

    धर्म-अधर्म की गहराई में खुद को नाप रहा अर्जुन

    अश्रुधार फिर तेज़ हुई और थर-थर काँप रहा अर्जुन

    हे केशव! ये रक्त स्वयं का पीना नहीं सरल होगा

    यदि विजय हुए तो भी यहाँ जीना नहीं सरल होगा

    हे माधव! मुझे बतलाओ कुल नाशक कैसे बन जाऊं

    रख सिंहासन लाशों पर मैं शासक कैसे बन जाऊं

    कैसे उठेंगे कर उन पर जो कर पर अधर लगाते है?

    करने को जिनका स्वागत ये कर भी खुद जुड़ जाते है

    इन्हीं करों ने बाल्य काल में सबके पैर दबाए है

    इन्हीं करों को पकड़ करों में पितामह मुस्काये है

    नोक जो अपने बाणों की फिर इनकी ओर करूँगा मैं

    केशव मुझको मृत्यु दे दो उससे पूर्व मरूँगा मैं

    बाद युद्ध के मुझे ना कुछ भी पास दिखाई देता है

    माधव! इस रणभूमि में बस नाश दिखाई देता है

    बात बहुत भावुक थी पर जगत गुरु मुस्काते थे

    ज्ञान की गंगा गीता द्वारा चक्रधारी बरसाते थे

    जन्म-मरण की योद्धा यहाँ पे बिल्कुल चाह नहीं करते

    क्या होगा अंजाम युद्ध का ये परवाह नहीं करते

    हे पार्थ! यहाँ कुछ मत सोचो बस कर्म में ध्यान लगाओ तुम!

    बाद युद्ध के क्या होगा ये मत अनुमान लगाओ तुम

    इस दुनिया के रक्तपात में कोई तो अहसास नहीं

    निज जीवन का करे फैसला नर के बस की ये बात नहीं

    तुम ना जीवन देने वाले नहीं मारने वाले हो

    ना जीत तुम्हारे हाथों में तुम नहीं हारने वाले हो

    ये जीवन दीपक की भांति यूँ ही जलता रहता है

    पवन वेग से बुझ जाता है वरना जलता रहता है

    मानव वश में शेष नहीं कुछ फिर भी मानव डरता है

    वह मर कर भी अमर हुआ जो धर्म की खातिर मरता है

    ना सत्ता सुख से होता है ना सम्मानों से होता है

    जीवन का सार सफल बस बलिदानों से होता है

    देहदान योद्धा ही करते है ना कोई दूजा जाता है

    रणभूमि में वीर मरे तो शव भी पूजा जाता है

    सेना युद्ध में जैसे अपने खोते शस्त्र बदलती है

    दिव्य आत्मा मानव देह में वैसे वस्त्र बदलती है

    हे केशव! कुछ समझ गया पर कुछ-कुछ असमंजस में हूँ

    इतना समझ गया कि मैं ना स्वयं ही खुद के वश में हूँ

    ये मान और सम्मान बताओ जीवन के अपमान बताओ

    जीवन मृत्यु क्या है माधव? रण में जीवन दान बताओ

    काम क्रोध की बात कही मुझको उत्तम काम बताओ

    अरे! खुद को ईश्वर कहते हो तो जल्दी अपना नाम बताओ

    इतना सुनते ही माधव का धीरज पूरा डोल गया

    तीनों लोकों का स्वामी फिर बेहद गुस्से में बोल गया

    सारे सृष्टि को भगवान बेहद गुस्से में लाल दिखे

    देवलोक के देव डरे सबको माधव में काल दिखे

    अरे! कान खोल कर सुनो पार्थ मैं ही त्रेता का राम हूँ

    कृष्ण मुझे सब कहते है मैं द्वापर का घनश्याम हूँ

    “रूप कभी नर नारी का धर के मैं ही केश बदलता हूँ

    धर्म बचाने की खातिर में भेष बदलता हूँ!”

    “विष्णु जी का दशम रूप मैं परशुराम मतवाला हूँ

    ना कालिया के फण पे मैं मर्दन करने वाला हूँ!”

    “बकासुर और महिषासुर को मैंने ज़िंदा कर दिया

    नरसिंह बन के धर्म की खातिर हिरण्यकश्यप फाड़ दिया!”

    “रक्त निक नहीं भी चलता है मैं ही आगे बढ़ता हूँ

    धनुष हाथ में तेरे पर रणभूमि में लड़ता हूँ!”

    इतना कहकर मौन हुए फिर खुद ही सकुचाये केशव

    पलक झपकते ही अपने दिव्य रूप में आये केशव

    दिव्य रूप का तेज़ अनोखा सबसे अलग दमकता था

    कई लाख सूरज जितना चेहरे पर तेज़ चमकता था

    इतने ऊँचे थे भगवान सिर लगता था

    और हज़ारों बुझाने कर अर्जुन को डर लगता था

    पवनजल उनके कदमों को चूम रहा था और

    तर्जनी उंगली में चक्र सुदर्शन घूम रहा था

    नदियों की कल कल सागर का शोर सुनाई देता था

    श्री कृष्ण के अंदर पूरा ब्रह्मांड दिखाई देता था

    जैसे ही मेरे माधव का थोड़ा सा बड़ा हुआ

    सहमा सहमा था अर्जुन एकदम रथ पर फिर खड़ा हुआ

    गीता के से सीधे हृदय में ऐसे प्रहार हुआ

    मृत्यु के आलिंगन के लिए फिर अर्जुन तैयार हुआ

    मैं धर्म भुजा का वाहक हूँ मुझको कोई मार नहीं सकता

    जिसकी रथ पर भगवान हो वो युद्ध में हार नहीं सकता

    जितने यहाँ अधर्मी हैं चुन चुन कर उन्हें सज़ा दूँगा

    इतना रक्त बहाऊंगा धरती की प्यास बुझा दूँगा

    अर्जुन की आँखों में धर्म का राज दिखाई देता था

    पार्थ में अब के केशव को बस यमराज दिखाई देता था

    जिधर चले फिर बाण पार्थ के सब पीछे हट जाते थे

    रणभूमि के कोने कोने लाशों से पट जाते हैं

    यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

    परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

    कुरु-क्षेत्र की भूमि पे तब नाच नचाया अर्जुन ने

    सारी धरती लाल मचाया अर्जुन ने

    बड़े-बड़े योद्धाओं को भी नानी याद दिलायी थी

    मृत्यु का वह ताण्डव था जो मृत्यु भी घबराई थी

    ऐसा लगता था सबको मृत्यु से प्यार हुआ है जी

    धर्म का ऐसा युद्ध जगत में पहली बार हुआ है जी

    धर्मराज के शिष्य के ऊपर राजमुकुट की छाया थी

    पर ये दुनिया जानती थी ये बस शक की माया थी

    धर्म की रक्षा करने वाले दाता दया निधान की जिए

    हाथ उठाकर सारे बोलो चक्रधारी भगवान की जय!

    धर्म की रक्षा करने वाले दाता दया निधान कीजिये

    कमेंट के सेक्शन में सारे बोलो भगवान की जय!

    चक्रधारी भगवान की जय!